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कहानी दो फैसलों की- भारती गौड़

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Friday, July 3, 2020

दो फैसले आए इन दिनों। 
गुवाहाटी हाईकोर्ट तलाक मामला जिसमें मंज़ूरी दी गई दूसरा दिल्ली हाईकोर्ट तलाक मामला अर्ज़ी अस्वीकार कर दी गई। दोनों के आधार भी हम देखेंगे। ये आपको मोटे तौर पर कोर्ट बनाम कोर्ट लगेगा ही। 
तलाक एक ऐसा मसला जो नितांत निजी होते हुए भी सामाजिक सरोकार से जुड़ा क्योंकि विवाह नाम "संस्था" के अंतर्गत आता है क्योंकि सामाजिक सन्दर्भों के बिना इसको भारतीय परिप्रेक्ष्य में समझना टेढ़ी खीर नहीं बल्कि एक धतुरा है। तलाक के मसलों में फैमिली काउंसलिंग अतिआवश्यक इसीलिए की गई क्योंकि ऐसे तो कोई भी कभी भी जाकर तलाक माँगेगा और फिर आपकी इस संस्था का होगा क्या!

भारत में अलग अलग धर्मों के अनुसार तलाक की प्रक्रिया चलती है अलग अलग कानून के तहत:
  • हिन्दू विवाह अधिनयम, 1955, जिसमें हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध धर्म शामिल हैं।
  • ईसाइयों के लिए तलाक अधिनियम, 1869, और भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, 1872 है।
  • मुस्लिमों के लिए तलाक की प्रक्रिया (personnel laws of divorce and the dissolution of marriage act, 1939) और मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 द्वारा नियंत्रित है और अब तीन तलाक कानून भी पारित हो चुका है।
  • पारसियों के लिए, पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 के तहत है।
  • अन्य सभी धर्मों और और सामान्य मुद्दों के लिए विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत आता है ये सब।
ये तो हुई कानूनी जानकारी।

कोर्ट में दो चीजें होती है एक होता है निर्णय और एक होता है आदेश। निर्णय में बहुत कुछ शामिल रहता है भारी चीज़ है ये और आदेश आप तक दो चार पंक्तियों के रूप में पहुँचता है। गुवाहाटी हाईकोर्ट में और आधारों के साथ साथ एक जिस आधार को तलाक के लिए वैध बताया उस पर लोगों में गुस्सा है। होना भी चाहिए। 

हमारे कोर्ट वक़्त वक़्त पर प्रगतिशीलता की भी नजीरें देते रहे हैं साहसी फैसलों के रूप में जिसमें 377 और 497 शामिल है। ये निरपेक्ष रूप से प्रगतिशीलता का परिचय था है और कानून के इतिहास में हमेशा रहेगा। एलजीबीटी और अडल्ट्री के वक़्त भी एक बहुत बड़े तबके की भौंहे तन गई थी और कोर्ट को खूब गरियाया गया था लेकिन कोर्ट को कभी एक पैसे का फर्क पड़ता नहीं है।  एलजीबीटी पर लिखने पर मुझे और मेरे दोस्त अजीत भारती को खूब लानतें भेजी तथाकथित प्रगतिशील किन्तु कुंठित लोगों ने लेकिन जैसे कोर्ट को फर्क नहीं पड़ता, हमें कौनसा पड़ता है।

बात गुवाहाटी केस की
जिसमें और आधारों के साथ चूड़ी, सिंदूर और बिंदी को आधार बनाया गया है तलाक का। ध्यान दीजिएगा कि इसे और आधारों के साथ एक आधार बनाया गया है ये एकमात्र आधार नहीं बनाया गया है।अब बात ये कि क्या एक कोर्ट से ये उम्मीद की जा सकती है कि वो आगे कदम रखती हुई पीछे खिसक जाए! जी नहीं। कतई नहीं। ये उम्मीद के भी परे का आधार है।

लेकिन.. लेकिन हमारे भारतीय कानून जिनका ऊपर मैंने सिर्फ नाम बताया है, के विस्तार के अंतर्गत बहुत कुछ ऐसे आधार हैं जो समाज, संस्कृति, आपके आस पास का कल्चर, समुदाय, माहौल जिसमे परिवेश शामिल होता है को ध्यान में रखकर आधार बनाए जाते हैं और जो पहले से बने हुए हैं। चूँकि पारिवारिक मसलों में एक्ट्स और रुलिंग्स बहुत ही ज्यादा काम्प्लेक्स होते हैं जिसमें तलाक के मामलों में विवाह से सम्बंधित तमाम तरह के लोकप्रचलित मानकों को भी जज को ध्यान में रखना पड़ता है खासकर तब जब वादी ने भी इसे अपने दाखिल पत्र में रखा हो एक बिंदु के रूप में।

गुवाहाटी मामले में इसे आधार बनाया जाना गलत तो खैर है ही इसका कोई न्यायोचित कारण हो नहीं सकता लेकिन वादी ने इसे शामिल किया तो और आधारों में जज ने इसे भी जोड़ दिया। और इसलिए ये बहस छिड़ी। बाकी कारण और भी रहे जिसमें लड़की द्वारा लड़के को अपने माता पिता से अलग रहने औए दहेज़ के आरोप भी शामिल हैं।

जो लोग सिंदूर और बिंदी पर बात कर रहे हैं उनमें से अधिकतर का तर्क एकदम सही है कि आप और आधारों पर दें फैसला कोई दिक्कत नहीं लेकिन इसको आधार बनाएँगे तो दिक्कत तो होनी ही है क्योंकि ये कहीं से भी नज़ीर के लायक नहीं। जिसे आगे किसी केस में कोट किया जा सकता है और फिर ये एक उदाहरण के रूप में स्थापित होने में वक़्त ही कितना लगेगा वो भी भारतीय समाज में जहाँ एकता कपूर के नाटकों की बहुओं के रूप को कोटे किया जाता हो बहुओं में संस्कार जगाने की घटिया मंशा के रूप में।

परम्पराओं की बात तब तक भी झेली जा सकती है जब तक इसमें लैंगिक पूर्वाग्रह ना हो और ये लैंगिक निरपेक्ष आग्रह के रूप में हो। आप औरतों पर थोपते जाएँगे और आदमियों को फ्री हैण्ड करते जाएँगे वैवाहिक प्रतीकों के मामले तो दिक्कत तो सौ फीसदी होनी ही है क्योंकि जब आप काल परिप्रेक्ष्य जोड़ते हैं तो आप भी तो देखिए कि आप कौनसे काल की बात कर रहे हैं। पहले ऐसा होता था तो पहले तो बहुत कुछ होता था। 
भारतीय समाज में कम्फर्ट बहुत ही लैंगिक पक्षपात के रूप में रहा है क्योंकि इसकी झडें इतनी गहरी हैं कि खोदने पर सभ्यताओं के आक्रमण हो जाएँगे और जाने क्या क्या मिलेगा।  बाकि गुवाहाटी वाले केस में तलाक सिर्फ उस आधार पर नहीं हुआ है लेकिन तमाम आधरों में से उस एक बेकार आधार पर जो बहस चल निकली है वो जारी रहनी चाहिए क्योंकि वो बहुत ज़रूरी है।

अब आइए दिल्ली केस पर।
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि यदि नवविवाहिता अपने कमरे में रहती है और घरेलु कामकाज में रूचि नहीं लेती है तो ये कोई पति के खिलाफ क्रूरता का मामला नहीं बनता जिस पर तलाक मांग लिया जाए। कोर्ट ने कहा कि ये ससुराल वालों की भी ज़िम्मेदारी है की आप उसे अपनत्व महसूस करवाएँ। एकदम से कोई कैसे नए परिवेश में ढल सकता है।

ये तो हुई दो बातें जिसमें एक में गलत बात को नज़ीर बनाया गया और दूसरे में ऐसी किसी बात को गलत नज़ीर बनने से रोका गया। चूड़ी, सिन्दूर, घरेलु कार्य, सबको साथ लेकर चलने की ज़िम्मेदारी, सबको खुश रखने की कवायद, बच्चा पैदा करके देना ही, हर तरह के सामंजस्य और समायोजन की उम्मीद रखना... अब देखिए शादी नामक संस्था की आधारभूत बातें है जो औरतों से अपेक्षित होती हैं। आदमियों से क्या अपेक्षित होता है शादी के बाद! यही कि कमाकर लाए, बच्चे पैदा होने के बाद उनकी शिक्षा का प्रबंध, पत्नी की जेवर कपड़ा दे, घर बनाकर दे, वगैरह वगैरह। इसमें पति पत्नी दोनों कमाते हों तो ये पारस्परिक सहयोग वाले पहलू पर शिफ्ट हो जाती हैं ज़िम्मेदारियाँ। लेकिन वो बोझ जो औरत पर ही रहता है वो किसी भी सूरत में आदमी पर शिफ्ट नहीं होता और शुरू होती है दिक्कतें यहाँ से।

लोक अदालतों में मैंने कम से कम डेढ़ सौ से ऊपर और संस्था में तो खैर सैंकड़ों तलाक के मामलो में काउंसलिंग करी है। 75 प्रतिशत मामलों में तलाक पति पत्नी के झगड़ों की वजह से नहीं होते। जी हाँ। ज़्यादातर मामलो में ससुराल पक्ष, उनके रिश्तेदार और कुछ मामलों में पीहर पक्ष की वजह से होते हैं क्योंकि जब ये है ही एक संस्था तो इसमें पति पत्नी खुश हो ना हो परिवार और आस पड़ोस, समाज, रिश्तेदार खुश रहने चाहिए। भारतीय इन मामलों में कभी नहीं सुधरेंगे और इसीलिए मैं एक गैर सामाजिक इन्सान हूँ और मरते दम तक रहूँगी। खैर..

सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि ब्याह भी करना है और ये स्वीकार भी नहीं करना है कि असल में ये दो लोगों का एक साथ नई जिंदगी शुरू करने का अति नाज़ुक मामला है। इसे ऐसे देखा जाता है कि "ये तो करना ही पड़ेगा", "यही सदियों से चला आ रहा रिवाज है", "तुम कोई नई आई हो क्या", "आदमी नहीं कमाएगा तो कौन कमाएगा, ये घर संभालता अच्छा लगता है क्या", "आजकल तो सब अलग ही रहते हैं माँ बाप को साथ रखने की ज़रूरत क्या है", "अब शादीशुदा है तो लगना भी तो पड़ेगा" पचासों घिसी पीटी बातें और सड़े गले रिवाज़ जो घिसट घिसटकर खुद दम तोड़ने के कगार पर हैं और जिनकी वजह से जाने कितने घर टूट गए लेकिन लोग जोंक की तरह चिपककर रहने से बाज़ नहीं आते। अपना अपना ईगो।

अरे जब ब्याह कर ही रहे हो तो समझो न इस बात को कि ज़िन्दगी किसके लिए जीना चाहते हो! प्राथमिकता किसकी ख़ुशी होनी चाहिए! दो लोग साथ मिलकर एक दूसरे की बजाय तीसरे को खुश क्यों करना चाहते हैं!
एक लड़की तो अपना सब कुछ छोड़कर आती है। आप ये उम्मीद रखते हैं कि आते ही इसका नया अवतार हो जाए। अरे ऐसे कैसे भाई? और लड़की ये क्यों सोचे कि माँ बाप क्यों साथ रहें? क्या आप अपने माँ बाप के लिए ऐसा सोच पाती हैं?

लड़ते रहिए, घर आपके बर्बाद होते हैं लोग तो मरे हुए के खाने में भी नमक शक्कर की कमी निकाल आते हैं, आपके जख्मों पर भी नमक ही रगड़कर जाएँगे। नमक उनका प्रिय स्वाद है। शादी का मतलब प्यार से कहीं ज़्यादा सामंजस्य, समायोजन, बलिदान, समझौते और दोस्ती है, लोगों को खुश करते रहने की कवायद नहीं। जो रिवाज़ गले में सांप की तरह लटके हों और जिससे जीवन ज़हर हो रहा हो उसे त्यागकर आगे बढ़ने में समझदारी है क्योंकि ज़िंदगी प्यार और सम्मान मांगती है ये मटेरियल से बनी चीज़ें नहीं। आपके समाज की हालत तो ये है कि पति कॉफ़ी बनाकर दे दे तो उसे किस्मत से जोड़ दिया जाता है आप सोचिए आपको किस तरह की बातों के साथ बड़ा किया गया है कि ये सोच है आपकी। कैसा माहौल है हमारे यहाँ! ज़रूरत को भी लक बोल दिया जाता है।

आदमियों द्वारा औरतों के लिए कॉफ़ी चाय बनाकर दे देना अगर किस्मत है तो आपको किस्मत को री डिफाइन करने की ज़रूरत है क्योंकि आपके इस बेकार से जुमले के अनुसार तो दुनिया सिर्फ और सिर्फ खुशकिस्मत आदमियों से भरी पड़ी है क्योंकि सदियों से औरतें रसोई में खप गई हैं उनके लिए।  सीधी से बात है कि ज़रूरत को नसीब नहीं कहा जा सकता और ख्वाहिश को ख्वाब नहीं कहा जा सकता। पहले अपनी कंडीशनिंग सुधारिए फिर दूसरों की। हम स्वस्थ नहीं तो सामने वाले को भी सिवाय संक्रमण के और क्या देंगे। जो ये सब शौक से करते हैं उन्हें शौक से करने दीजिए और जो नहीं करना चाहते उनको मजबूर करके उनके मालिक मत बनिए।

कोई माई का लाल किसी की ज़िन्दगी का मालिक नहीं है और फिर भी नहीं मानना तो आइए कोर्ट खुले ही हैं।
बाकि गलत बातों को कोर्ट भी नज़ीर बनाएगा तो सुनेगा ही क्योंकि जज भगवान नहीं और हमारी सभ्यताओं में तो भगवन भी अपराधमुक्त नहीं हो पाए कभी। जो नहीं समझते उनके लिए ही कोर्ट में हम जैसे बैठे रहते हैं काउंसलिंग के लिए और जो समझते हैं वो कभी कोर्ट पहुँचते ही नहीं। शादी दो लोगों का पहले है मसला उसके बाद है किसी तीसरे का मसला। बस इतना समझना है बस इतना। और वो दो खुश नहीं तो किसी तीसरे को हरगिज़ खुश नहीं कर सकते वो इसलिए पहले उन्हें तो सुलझने दीजिए। बाकी आपकी इच्छा। शादी हुई है भई पुनर्जन्म नहीं। समझना दोनों को‌ होगा।

जहाँ तक मेरी बात है तो मैं क्या पहनूँगी क्या‌ नहीं इसका फैसला या तो मैं करूँगी या सिर्फ मैं करूँगी। पायल आभूषण समझकर पहनी है, बेड़ियाँ समझकर पैरों में जो डालेगा, उसी से उसके हाथ बाँध दूँगी। स्पष्ट है।
(बहुत ही व्यापक स्तर पर बात करने वाला विषय है जिसमें बहुत सारे पहलू हैं। मैंने बस मामूली सी चीज़ें मोटे तौर पर शामिल की है। जटिल प्रक्रिया होती है ये बहुत ही)

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भारती गौड़ 
Author of जाह्नवी, Counsellor (Psychologist)

तुम गए ही नही पिता- संदीप नाइक

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Saturday, June 20, 2020


अब चिट्ठियां आती नही तुम्हारे नाम - बिजली, फोन, मकान के टैक्स से लेकर राशन कार्ड तक में बदल गए है नाम 

कोई डाक, पत्रिका, निमंत्रण तुम्हारे नाम के आते नही 

हमारे बड़े होने के ये नुकसान थे और एक सिरे से तुम्हारा नाम हर जगह गायब था 

कितनी आसानी से नाम मिटा दिया जाता है हर दस्तावेज़ से और नाम के आगे स्वर्गीय लगाकर भूला दिया जाता है कि अब तो स्वर्ग में हो वसन्त बाबू और बच्चें तुम्हारे ऐश कर रहें हैं

बच्चों से पूछता नही कोई कि बच्चें कितना ख़ाली पाते हैं अपने आपको कि हर दस्तावेज़ से नाम मिटाकर अपना जुड़वाने में कितनी तकलीफ़ हुई थी और अब जब बरसों से सब कुछ बिसरा दिया गया है तो नाम भी लेने पर काँप जाती है घर की नींव जिसमे तुम्हारे पसीने और खून की खुशबू पसरी है 

घर में मिल जाती है कोई पुरानी याद तो घर के दरवाज़े और छतें सिसकियों से भर उठती है रात के उचाट सन्नाटों में ..

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संदीप नाईक 
सी 55, कालानी बाग
देवास मप्र 455001
मोबाइल 9425919221
(देवास मप्र में रहते है, 34 वर्ष विभिन्न प्रकार के कामों और नौकरियों को करके इन दिनों फ्री लांस काम करते है. अंग्रेज़ी साहित्य और समाज कार्य मे दीक्षित संदीप का लेखन से गहरा सरोकार है, एक कहानी संकलन " नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथाएँ" आई है जिसे हिंदी के प्रतिष्ठित वागीश्वरी सम्मान से नवाज़ा गया है , इसके अतिरिक्त देश की श्रेष्ठ पत्रिकाओं में सौ से ज़्यादा कविताएं , 150 से ज्यादा आलेख, पुस्तक समीक्षाएं और ज्वलंत विषयों पर शोधपरक लेख प्रकाशित है)

पुरुषों में बढ़ते डिप्रेशन का ग्राफ- भारती गौड़

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Tuesday, June 16, 2020

भारत में पुरुषों की तुलना में महिलाओं में डिप्रेशन अधिक होता है किन्तु आत्महत्या पुरुष ज़्यादा करते हैं। क्यों.. आइये बताती हूँ।
मैं ज़्यादा नहीं लेकिन थोड़े बहुत आँकड़े रखना चाहूँगी जिससे तस्वीर साफ़ हो। मैं अगर मेरे राजस्थान विशेष की बात करूँ तो बीते दस बरसों में 14 हज़ार 719 महिलाओं ने जबकि 34 हज़ार 249 और एक ट्रांसजेंडर ने राजस्थान में आत्महत्या की।
महिलाओं में डिप्रेशन ज़्यादा होता है पुरुषों की तुलना में लेकिन आत्महत्या पुरुष ज़्यादा करते हैं महिलाओं की तुलना में क्योंकि पुरुषों में डिप्रेशन होता है ये बात आपके समाज में पहले स्तर पर तो स्वीकार नहीं की जाती। जब स्वीकार ही नहीं की जाती आसानी से तो इलाज और उबरना भी उतना ही मुश्किल रहेगा। कहाँ जाकर दिल खाली करें!
कैसे... वो ऐसे...
सख्ती की चादर, मर्दवादी कंडीशनिंग, कठोर ह्रदय, मर्द को दर्द नहीं होता, यार मैं भी बिखर गया तो कैसे चलेगा... खुद ही के खिलाफ खुद के द्वारा खड़ी की गई दीवारें जिनको अभेद्य बनाने के जतन भी स्वयं द्वारा। कठोरता का आवरण और उस पर बेदर्दी से सीमेंट चढ़ाकर और पक्का कर देना।

मेरे पास लड़के ज्यादा आते हैं डिप्रेशन के पेशेंट्स।
  • 'मर्द होकर रोता है!'
  • लड़का होकर लड़कियों की तरह आँसू बहा रहा है!'
  • शर्म आनी चाहिए इससे अच्छा तो लड़की ही पैदा हो जाता!'
  • 'अब आदमी ज़ात को कहाँ शोभा देता है यूँ टूटना!'
  • 'मर्द भी यूँ रोने लगे तब तो चल गया घर!'
  • 'इसको किस बात का डिप्रेशन, सुंदर बीवी, बच्चे, अच्छी खासी नौकरी!'
  • 'मर्द है भी कि नहीं! देखो तो कैसे कोने में बैठकर रो रहा है!' आदि इत्यादि।

मैं एक बात कोट करना नहीं भूलती हूँ कि घर से मिली कंडीशनिंग आपका मरते दम तक पीछा नहीं छोड़ती चाहे अच्छी हो चाहे बुरी और दुर्भाग्यवश जेंडर के मामले में हमारे यहाँ बहुत गंदगी मची हुई है।

लड़का है तो नौकरी करनी ही होगी। सपने में भी नहीं सोच सकता कि घर संभाल ले। उसको सहूलियत ही नहीं कि बिना नौकरी का सोचे जीवन बिता दे। अपवाद की बात हम नहीं करेंगे क्योंकि उससे उदाहरण नहीं बनते।दबाव की बाते करें तो ये सिर्फ समाज या परिवार का ही बनाया हुआ नहीं है पुरुषों पर, ये उनका स्वयं का भी पैदा किया हुआ है।

तनाव/विषाद और स्ट्रेस (प्रतिबल) क्या होता है:
परिस्थितियाँ, जो व्यक्ति को समायोजन और समाधान से दूर ले जाती हैं, उसमें संवेगात्मक विचलन और विरोध पैदा करती है, तनाव के रूप में सामने आती हैं। ऊपरी तौर पर ना भी उस तरह से दिखाई दे किन्तु अन्दर ही अन्दर इस कदर संचय हो जाता है तनाव का कि व्यक्तित्व में जटिलता आ जाती है फलस्वरूप दिनचर्या से लगाकर मानसिक स्वास्थ्य तक इसकी ज़द में आकर भयंकर परिणाम की और निकल पड़ते हैं।

स्ट्रेस क्या है; दबावपूर्ण परिस्थितियों में स्वयं को असमायोजन से भरी मानसिक जटिलताओं से घिरा हुआ पाना।
साधारण शब्दों में कहूँ तो कुल मिलाकर समायोजन न कर पाना ही आपका तनाव है, प्रतिबल है जिसके फलस्वरूप अंतर्द्वंद (conflict), कुंठा (frustration) और दबाव (pressure) पैदा होते हैं।
अंतर्द्वंद- अंतर्द्वंद तब होता है जब दो विरोधी उद्दीपक( परिस्थितियाँ) उत्पन्न हो जाए और दोनों को एक साथ पाने की ललक हो और वो संभव ना हो।
कुंठा- उन दो विरोधी प्रेरकों को ना पाने से उत्पन्न स्थिति कुंठा है।
दबाव- उपर्युक्त वर्णित दोनों अवस्थाओं से निकलने या उनको जीतने की स्थिति।
कमोबेश एक ही तरह के कारण होते हैं महिलाओं और पुरुषों के तनाव के किन्तु पुरुषों में कुछ बातें अलग तरह से दबाव डालती हैं यथा;
  1. पुरुषत्व का दबाव; जो मैंने सबसे पहले ऊपर बताया।
  2. पुरुषों के रोने पर उन्हें शर्मिंदगी महसूस करवाना।
  3. खुद स्वीकार न करना कि हम अवसाद में हैं।
  4. पारिवारिक दबाव जिसमें सदियों पुरानी कंडीशनिंग से लगाकर उसे आज तक पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित करती पारिवारिक और सामाजिक इकाईयाँ।

क्यों होता है डिप्रेशन:
  1. जैविक करक; इसमें संक्रामक रोग, शारीरिक आघात, आहार से सम्बंधित दोष, नशा आती इत्यादि आते हैं।
  2. मनोवैज्ञानिक करक; इसमें कुंठा, असफलताएँ, हानियाँ, पर्सनल लिमिटेशंस, फीलिंग ऑफ़ गिल्ट, असंबद्धता और निरर्थकता, अंतर्द्वंद, दबाव आदि आते हैं।
  3. सामाजिक कारक; इसमें राजनीतिक उथल पुथल, युद्ध हिंसा, समूह पूर्वाग्रह और उससे उपजे पक्षपात एवं विवाद आदि।
  4. आर्थिक और कार्य से सम्बंधित कारक, विवाह और निजी रिश्तों से उपजी समस्याएँ जिनका कैनवास बहुत फैला हुआ है, कारकों में आते हैं।
मेरे पास आने वाले डिप्रेशन के पेशेंट्स को सबसे पहले मैं एक ही काम करवाती हूँ और वो है खुलकर रोना। जितने सेशंस हो जाएँ तो हो जाएँ, रोइए पहले। कहना नहीं पड़ता, उनके अवसाद को जगह मिलते ही वो रोना चाहते हैं और रोते हैं।
एक बात बहुत स्पष्ट रूप से बता देना चाहती हूँ कि जो रो नहीं सकते वो मजबूत नहीं बल्कि उन्हें हार्मोन्स से सम्बंधित समस्या है इसलिए किसी के ना रोने को ग्लोरिफाई मत कीजिए ये उनके लिए चिंता का विषय है।
पुरुषों के अवसाद को स्पेस नहीं मिलता क्योंकि जो कारण मैंने ऊपर बताएँ हैं जिसमें उन पर थोपे गए कारणों के साथ साथ उनके खुद के भी पैदा किए गए कारन मुख्य हैं। ये मुख्या वजह है कि विषद होता औरतों में ज़्यादा है किन्तु आत्महत्या पुरुष ज़्यादा करते हैं।
आप अपनी ज़िंदगी में पुरुषों को ना सिर्फ इनके रोने का स्पेस दें, सहूलियत दें, बल्कि उनके द्वारा की जा रही आत्महत्याओं को रोकने में अहम् भूमिका निभा सके हैं।
क्या औरत और क्या पुरुष, इस समाज में आपको चारों तरफ बराबर से पुरुष के रोने को कायरता से जोड़ते लोग मिलते हैं। क्यों हैं ऐसा?
आपको तो ये भी कहाँ पता है कि पुरुष ज़्यादा आत्महत्या करते हैं क्योंकि वो अपने अवसाद से लड़ नहीं पाते वही पुरुष जिसे मर्द शब्द से इतना खोखला कर दिया गया है कि खुद को मार देने से उसे परहेज़ नहीं और इस बीमार ग्रंथि को पोसने वाले जहाँ तक नज़रें दौड़ाएंगे, नज़र आएँगे।
रोने क्यों नहीं देते आप पुरुषों को! रोना कोई मानसिक अवस्था नहीं है। शारीरिक है। हार्मोन्स से जुड़ी हुई है। आप कौन होते हैं उसे रोकने वाले। भूख लगी खाना खाया, प्यास लगी पानी पिया, शरीर की तलब लगी सेक्स किया तो रोना आया तो रोए क्यों नहीं?
ये तो बात हुई समाज और परिवार की जिसकी वजह से पुरुषों में अवसाद उन्हें एक अलग स्तर पर ले जाने वाले कारणों में से अहम् भूमिका में है।

आप ही के द्वारा डिप्रेशन से छुटकारा पाने के तरीकों पर।
1. स्त्रोत- उस स्त्रोत की पहचान कीजिए जिससे तनाव पैदा हुआ और जगह घेरता जा रहा है।
2. अहम्- पुरुषों में एक नेचुरल अहम् की प्रवर्ती होती है जिसकी वजह से वो स्वीकार करने में बहुत वक़्त लगा देते हैं, तो उससे दूर होने के लिए थोड़ा होम वर्क कीजिए और अपने से अपोज़िट जेंडर वाले व्यक्ति के सामने अपनी बात रखिए।
3. काम को अंजाम देने की सक्रियता और निष्क्रियता में स्पष्ट अंतर पहचानिए। करना चाहते भी हैं या नहीं कोई काम या करना चाहते हैं लेकिन एफ्फ़र्ट्स ही नहीं हैं।
4. तनाव को खदेड़ने की प्रत्यक्ष प्रतिक्रियाएँ बनाम अप्रत्यक्ष प्रतिक्रियाएँ-
4.1 प्रत्यक्ष में स्थायी समाधान मिलेगा आपको जैसे कि अटैक; इसमें सीधी कार्यवाही परिस्थितियों और अवांछित लोगों के प्रति। साधारण शब्दों में कहूँ तो वस्तुनिष्ठ निर्णय ना कि व्यक्तिनिष्ठ।
4.2 वापसी(withdrawal) इसके लिए मैं आपको अभी का ताज़ा उदाहरण दूँगी। जैसे कोरोना। आपके पास इससे लड़ने के रास्ते अभी नहीं है इसलिए इससे दूर रहना और भागना आपको बचाएगा। हर वक़्त सामना करना और लड़ना भी समझदारी नहीं है। कभी कभी आपको भागना भी पड़ता है और वो भागना पॉजिटिव है।
4.3 समझौता- इसमें समझौतापूर्ण संधान मदद करेगा। मतलब अड़े ना रहना किसी बात पर जिससे तनाव बढ़ता जाए।
4.4 अप्रत्यक्ष प्रतिक्रियाओं में मनोवैज्ञानिक स्तर पर समाधान आते हैं। मैंने पिछले लेख में इस पर डिटेल में लिखा है तो इसके लिए आप उस पर जाएँ।
5. डिप्रेशन में सबसे ज़्यादा कारगर समाधान कार्य निर्देशित प्रतिक्रियाएँ (task oriented reactions) ही हैं। ऑटोमेटिक और सुनियोजित तरीके इसमें मुख्य हैं जैसे;
5.1 समस्या को पहले स्तर पर समझना।
5.2 वैकल्पिक समाधान पर जाना।
5.3 सेफ निर्णय लेना।
5.4 फोलोअप करना।

दोस्तों सब तरीकों पर भरी पड़ता है एक तरीका और वो है रोना और खूब रोना। रोने के लिए सामाजिक अनुमोदन की ज़रूरत नहीं है जिस दिन आप खुद भी ये बात औरतों की तरह समझ जाएँगे, बहुत कुछ सुलझ जाएगा।
रोने से समस्या नहीं सुलझती कहने वालों से सोशल डिसटेंसिंग बनाए रखिए। पुरुषों को रोने पर ताने मारने वालों में स्वयं पुरुषों के अलावा औरतों की भी बहुत बड़ी भागीदारी है इसलिए आज से और अभी से आप जब भी किसी को "मर्द" होने का हवाला देकर रोने से रोके तब समझ ले कि आप गुनाहगार है उसके अवसाद को एक कदम और आगे धकेलने में।
मैं उन लोगों के लिए लिखती हूँ जिन्हें मेरी ज़रूरत है और जो ठीक होना चाहते हैं। जो ना तो खुद ठीक हैं और ना किसी को ठीक होता देखना चाहते हैं अपने "इफ" और "बट" के साथ ऐसे लोगों को एक सेकंड के लिए भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
पिछले लेखों के सन्दर्भ के बिना ना पढ़ें, चूक सकते हैं। एक लेख में सब कुछ समाहित हो भी नहीं सकता।
जो पुरुष स्वीकार कर सकते हैं कि वो डिप्रेशन में हैं और जो रोते हैं वो सबसे मजबूत हैं। ध्यान रखिए क्योंकि ये प्राकृतिक है।

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भारती गौड़ 
Author of जाह्नवी, Counsellor (Psychologist)

खून की बून्द और लाखों जीवन- संदीप नाईक

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Saturday, June 13, 2020

फोन की घण्टी बजती है स्क्रीन पर कोई अनजान नंबर है मैं फोन उठाता हूँ हेलो कहता हूँ और उधर से हड़बड़ाहट में आवाज आती है
" हेलो सर , आपका नम्बर सुधीर ने दिया है मुझे मेरे बच्चे के लिए खून चाहिए, ओ निगेटिव ग्रुप है सर प्लीज़ कुछ इंतज़ाम  करवा दीजिये हम लोग बाहर के है किसी को जानते नही है "

ये पैनिक कॉल है उनके लिए जो अचानक से मुसीबत में आ गए है पर उनके लिए यह पैनिक नही है जिन्हें फोन आया है , वे जवाब देते हैं हां देखते है किसी को खोजते है और फोन रख दिया जाता है

जिसे खून चाहिए अपने किसी भी परिजन के लिए या दोस्त के लिए वो लगातार फोन घूमा रहा है पर डोनर नही मिल रहे, मिल भी रहे तो व्यस्त है , शहर से बाहर है, काम पर है या अभी कल ही किसी को दिया था अब तीन माह दे नही पायेंगे - ये कुछ जवाब है जो अमूमन रक्त की मांग करने पर मिलते है. मुश्किल से पांच या दस प्रतिशत लोग हाँ कहते है और समय पर बताई हुई निर्धारित जगह पर खून देने जाते है 


मान्यताएं और समस्या 

भारतीय समाज मे रक्तदान अभी भी मिथकों के बीच गुजर रहा है रक्त जैसी चीज के लिए हम अभी भी मनुष्य के दान पर ही निर्भर है और इसका मनुष्य के अतिरिक्त कोई विकल्प नही है परंतु मान्यताएं और कई सारे ऐसे मानवीय पहलू है जिन्होंने इसे प्रचलित किया और समाज मे स्वीकार्य बनाया है , आज बहुत से लोग इसे अपना पुनीत कर्तव्य मानते हुए सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखकर रक्तदान करते है

स्वास्थ्य की एक शासकीय परियोजना में काम करते हुए देखता था कि आदिवासी क्षेत्रों के दूरस्थ इलाकों से महिलाएं जचकी के लिए शासकीय अस्पतालों में संस्थागत प्रसव के लिए आती थी जिनका हीमोग्लोबिन फूल टर्म पर चार या पांच ग्राम प्रति लीटर होता था, जब उनके पति या रिश्तेदारों से खून देने की अपील की जाती तो वे कहते थे कि हम खून नही देंगे - बीबी मरती हो तो मर जाये, पूछने पर कहते थे कि खून देने से कमजोरी आती है और नपुंसकता बढ़ती है , यह हालत तो हुई ग्रामीण क्षेत्रों की जहां कुपोषण या अल्प पोषण से महिलाएं कमजोर और गम्भीर एनीमिया की शिकार रहती है साथ ही चार से छह बच्चों को जन्म देना उनकी नियति बन जाता है पर शहरी क्षेत्रों में हालात बहुत अच्छे नही है

मेरे जानने वालों में कई मित्रों के बच्चे है जो थैलेसीमिया से पीड़ित है और उन्हें हर माह खून की जरूरत पड़ती है पर शहरी इलाकों में एक यूनिट खून का इंतज़ाम करने में अक्सर हाथ पांव फूल जाते है, कई गम्भीर रोग है जिनमे मरीजों को नियमित रूप से खून की आवश्यकता होती है , मेरे छोटे भाई की किडनी सन 2003 में जब फेल हुई तो उसका डायलिसिस चालू हुआ , दो वर्षों बाद ही उसे हर डायलिसिस के समय एक यूनिट खून की आवश्यकता पड़ने लगी, जान - पहचान में अक्सर मैं निगाह रखता था कि कौन सम्भावित रक्तदाता हो सकता था यहाँ तक कि मैंने मित्रों, रिश्तेदारों के नाम के साथ उनका रक्त समूह भी फोन बुक में सेव कर लिया था मसलन अंबुज "ओ पॉजिटिव" सोनी आदि और जब ये नम्बर बार बार आंखों के सामने से गुजरते तो हमेशा याद रहता , भाई का डायलिसिस उसकी मृत्यु यानि 2014 तक चला और मैं हर हफ्ते दो दानदाताओं की तलाश में रहता , रिज़र्व दाताओं की एक पृथक सूची थी उस समय व्यक्तिगत सम्बन्धों के आधार पर ही रक्त मिलता था

जीवन का ध्येय बनाये है 

आज सोशल मीडिया से लेकर विभिन्न संगठनों और समाजों के रक्तदाताओं के समूह बने है, वाट्सएप समूह है जहां अपील करने पर थोड़ी सुलभता से रक्त मिल जाता है, रेडियो पर भी आप खून की आवश्यकता के लिए उदघोषणा करवा सकते है , ब्लड बैंक में डोनर्स की सूची होती है. साथ ही अनेक लोगों ने इसे अपना ध्येय बना लिया है इंदौर में दीपक नाईक के लिए रक्तदान सबसे बड़ी और जरूरी प्राथमिकता है , उन्होंने अभी तक 128 रक्त दान करके रिकॉर्ड बनाया है - वे कहते है रक्त ऐसी चीज है जो बाज़ार में उपलब्ध नही है, इसलिये मेरे जीवन का उद्देश्य ही अब यही है, मेरे साथ मेरी टीम में सैंकड़ो लोग जुड़े है - हमे सूचना मिलने पर हममें से कोई भी तुरन्त रक्त दान करने पहुंच जाता है, दीपक कहते है अब हम थोड़ा सावधान भी है - हम कोशिश करते है कि रक्त उन लोगों को मिलें जो बच्चे है, युवा है और जिनमे जीवन की संभावना है, केंसर आदि जैसे गम्भीर मरीजों को देना अच्छी बात है पर इन्हें नियमित चाहिये और अंत सबको मालूम है इसलिये हम अब कोशिश करते है कि सम्भावनों से भरे जीवन को मदद पहुंचे, लोग रक्त का कई बार ग़लत इस्तेमाल भी करते है, कई रैकेट इसमें शामिल है बेहतर होता है कि आप इंदौर में है तो एमवहाय अस्पताल के ब्लड बैंक में जाकर दान करें और सम्पर्क करें जहां सेवा भावी समर्पित लोगों की टीम पूरी पारदर्शिता से काम करती है

सुनील धर्माधिकारी एक बैंक में काम करते है साथ ही समाज कार्य मे उनकी रुचि है - अपने मित्र प्रशांत बडवे के साथ मिलकर वे तरुण युवा मंच संचालित करते है जिसमे पांच सौ से ज्यादा युवा जुड़े है, ये युवा सूचना मिलने पर तुरन्त रक्तदान करने पहुंच जाते है और यह सब सेवा भाव से किया जाता है, सुनील बताते है कि बस हमे सूचना सही समय पर मिलना चाहिये - अभी प्रवासी मजदूरों के केस में एबी रोड इंदौर से लाखों लोग निकलें, तरुण युवा मंच ने जहां भोजन आदि की व्यवस्था की वही रोगियों को, गर्भवती महिलाओं को प्रसव के दौरान रक्त भी उपलब्ध करवाया 

पटना के कुमार प्रतिष्क अपने महाविद्यालय के छात्रों के साथ पटना शहर और आस पास के जिलों में रक्तदान करने वालों का समूह चलाते है, चमकी बुखार के समय उन्हें यह काम करने की प्रेरणा मिली और तब से वे इस पुनीत कार्य मे जुटे हुए है , वे कहते है " अभी भी रक्तदान को।लेकर पढ़े लिखें युवाओं में भ्रांतियां है , हम लगातार बात करके, डॉक्टर्स के व्याख्यान करवा कर उनकी शंकाओं को दूर करते है और रक्तदान के लिए प्रेरित करते है वे कहते है "रक्तदान महादान के मुहिम से जुड़ने पर हमें इससे जुड़ी कुछ परेशानियां भी देखने को मिली 

कई बार ऐसा होता है कि घर में बाकी सदस्यों में होने के बावजूद ब्लड के लिए कॉल करते हैं उन्हें यह लगता है कि इनका तो काम ही है ,इनसे व्यवस्था हो जाएगा,खुद देकर क्या करें , इस वजह से ऐसा भी होता है कि जिन्हें असल में जरूरत होती और जिनके पास उपलब्ध हो इसमें फर्क कर पाना मुश्किल होता है 

इसमें कोई दो राय नहीं की कोई भी व्यक्ति अपनी रुचि या समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हुए ऐसे मुहिम से जुड़ते हैं , पर चंद लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने निजी स्वार्थ या कह लें पैसों के लिए इन सारे मुहिम से जुड़ कर इसे दूषित भी करते हैं.  हम लोगों के पास भी कई ऐसे फोन कॉल आए जिसमें उन्होंने यह कहा की व्यवस्था करवा दीजिए रुपयों की चिंता मत कीजिए , पता नही शायद या तो मालूम नहीं कि रक्त पैसों में नहीं मिलता या वह समझते कि पैसा देख अच्छे अच्छे लोग बुरे बन जाते 

वास्तविकता यह है कि जब तक लोग ऐसे कार्यों से जुड़े लोगों को सराहने के साथ साथ खुद की मुहिम का हिस्सा नहीं बनेंगे तब तक रक्त की कमी से जान जाती रहेगी" 

रक्तदान दिवस 

विश्व रक्तदान दिवस हर वर्ष 14 जून को मनाया जाता है विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा इस दिन को रक्तदान दिवस के रूप में घोषित किया गया है. देश मे नेशनल एड्स कंट्रोल संस्थान, रेडक्रॉस के साथ कई स्वैच्छिक संगठन है जो रक्तदान को बढ़ावा देने का काम करते है

रक्त हमारे शरीर का वह तरल पदार्थ है जो शरीर की कोशिकाओं को आवश्यक पोषक तत्व व ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है . रक्त की कमी के कारण देशभर में लाखों लोग अपनी जान गंवा देते हैं.

मूलतः रक्त 4 प्रकार के होते हैं A, B, AB और O
हर ग्रुप में RhD एंटीजेन पॉजिटिव और RhD एंटीजेन नेगेटिव के वजह से कुल 8 ग्रुप बन जाते हैं. एक औसत व्यक्ति के शरीर में 10 यूनिट यानि (5-6 लीटर) रक्त होता है. रक्तदान में केवल 1 यूनिट रक्त ही लिया जाता है. एक बार रक्तदान से आप 3 लोगों की जिंदगी बचा सकते हैं

कौन कर सकते हैं रक्तदान
18 से 60 वर्ष की आयु तक का कोई भी स्वस्थ व्यक्ति रक्तदान कर सकता हैं, अगर आपका वजन 45 किलो से ज्यादा है और शरीर मे हीमोग्लोबिन 12% से ज्यादा है तो आप रक्तदान कर सकते हैं. रक्त दाता का वजन, पल्स रेट, ब्लड प्रेशर, बॉडी टेम्परेचर आदि चीजों के सामान्य पाए जाने पर ही डॉक्टर्स या ब्लड डोनेशन टीम के सदस्य आपका ब्लड लेते हैं. NACO के मुताबिक 1 स्वस्थ व्यक्ति हर 3 महीने पे 1 बार रक्तदान कर सकता है

कौन नही कर सकते रक्तदान
पीरियड से गुजर रही या बच्चे को स्तनपान कराने वाली महिलाएं रक्तदान नहीं कर सकतीं, रक्तदान के 48 घंटे पहले अगर किसी ने एल्कोहल का सेवन किया है तो रक्तदान नहीं कर सकता, 18 साल से कम उम्र वाला व्यक्ति और 65 वर्ष से अधिक साल का व्यक्ति रक्तदान नहीं कर सकता, अर्थात रक्तदान के लिए वही लोग योग्य होते हैं, जिनका वज़न 40 किलो से अधिक होता है.

रक्तदान को लेकर गलत भ्रांतियां

  • रक्तदान से कमजोरी होती है 
  • रक्तदान से शरीर मे खून की कमी हो जाती है 
  • रक्तदान करने से हमेसा चक्कर आती है 
पर ऐसा कुछ भी सही नही है 

रक्तदान के फायदे
एक रिसर्च में पाया गया की रक्तदान के कई फायदे भी होते हैं - जैसे हार्ट अटैक, मधुमेह, कैंसर की आशंका कम होन. शरीर में कोलेस्टॉल की मात्रा घटना. शरीर में ज्यादा आयरन होना भी शरीर के लिए हानिकारक हो जाता है. रक्तदान करने से आयरन की मात्रा भी शरीर में नियंत्रित रहती है. 

इस समय आवष्यकता इस बात की है कि रक्तदान से सम्बंधित भ्रांतियां दूर कर जागरूकता बढ़ाई जाए ताकि लाखो जान बचाई जा सकें 

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संदीप नाईक 
सी 55, कालानी बाग
देवास मप्र 455001
मोबाइल 9425919221
(देवास मप्र में रहते है, 34 वर्ष विभिन्न प्रकार के कामों और नौकरियों को करके इन दिनों फ्री लांस काम करते है. अंग्रेज़ी साहित्य और समाज कार्य मे दीक्षित संदीप का लेखन से गहरा सरोकार है, एक कहानी संकलन " नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथाएँ" आई है जिसे हिंदी के प्रतिष्ठित वागीश्वरी सम्मान से नवाज़ा गया है , इसके अतिरिक्त देश की श्रेष्ठ पत्रिकाओं में सौ से ज़्यादा कविताएं , 150 से ज्यादा आलेख, पुस्तक समीक्षाएं और ज्वलंत विषयों पर शोधपरक लेख प्रकाशित है)

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस स्पेशल

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Sunday, March 8, 2020


💥इन 15 महिलाओं ने भारतीय संविधान बनाने में दिया था अपना योगदान 💥

भारत में 26 नवंबर 1949 को निर्वाचित संविधान सभा द्वारा भारतीय संविधान अपनाया गया था और 26 जनवरी 1950 को इसे लागू किया गया था। संविधान सभा में कुल 389 सदस्य थे| लेकिन अब इसे संयोग कहें या दुर्भाग्य कि संविधान निर्माण के संदर्भ में हमें केवल अग्रणी पुरुष सदस्यों के रूप में डॉ बी आर अम्बेडकर ही याद है, जिन्होंने भारतीय संविधान का मसौदा तैयार करने में मदद की थी| यों तो हम जल्दी अपने इतिहास को नहीं भूलते है, पर जब हमारी सोच में पितृसत्ता का चश्मा होतो अक्सर हमारी नज़रों से आधी आबादी के पूरे पन्ने ओझल से हो जाते है| शायद यही वजह है कि संविधान सभा में हम उन प्रमुख पंद्रह महिला सदस्यों का योगदान आसानी से भुला चुके है या यों कहें कि हमने कभी इसे याद करने या तलाशने की जहमत नहीं की| तो आइये जानते है उन पन्द्रह भारतीय महिलाओं के बारे में जिन्होंने संविधान निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया है|

💥1. अम्मू स्वामीनाथन💥
अम्मू स्वामीनाथन का जन्म केरल के पालघाट जिले के अनाकारा में ऊपरी जाति के हिंदू परिवार में हुआ था। उन्होंने साल 1917 में मद्रास में एनी बेसेंट, मार्गरेट, मालथी पटवर्धन, श्रीमती दादाभाय और श्रीमती अंबुजमल के साथ महिला भारत संघ का गठन किया। वह साल 1946 में मद्रास निर्वाचन क्षेत्र से संविधान सभा का हिस्सा बन गईं। 24 नवंबर 1949 को संविधान के मसौदे को पारित करने के लिए डॉ बी आर अम्बेडकर ने एक चर्चा के दौरान भाषण में आशावादी और आत्मविश्वासी अम्मू ने कहा कि ‘बाहर के लोग कह रहे हैं कि भारत ने अपनी महिलाओं को बराबर अधिकार नहीं दिए हैं। अब हम कह सकते हैं कि जब भारतीय लोग स्वयं अपने संविधान को तैयार करते हैं तो उन्होंने देश के हर दूसरे नागरिक के बराबर महिलाओं को अधिकार दिए हैं।‘ वह साल 1952 में लोकसभा के लिए और साल 1954 में राज्यसभा के लिए चुनी गयी। उन्होंने भारत स्काउट्स एंड गाइड (1960-65) और सेंसर बोर्ड की भी अध्यक्षता की।

💥2. दक्षिणानी वेलायुद्ध💥
दक्षिणानी वेलायुद्ध का जन्म 4 जुलाई 1912 को कोचीन में बोल्गाटी द्वीप पर हुआ था। वह शोषित वर्गों की नेता थी। साल 1945 में, दक्षिणानी को कोचीन विधान परिषद में राज्य सरकार द्वारा नामित किया गया था। वह साल 1946 में संविधान सभा के लिए चुनी गयी पहली और एकमात्र दलित महिला थीं।

💥3. बेगम एजाज रसूल💥
मालरकोटला के रियासत परिवार में पैदा हुई और उनकी शादी युवा भूमि मालिक नवाब अजाज रसूल से हुई थी। वह संविधान सभा की एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य थी। साल 1950 में, भारत में मुस्लिम लीग भंग होने के बाद वह कांग्रेस में शामिल हो गयी। वह साल 1952 में राज्यसभा के लिए चुनी गयी थी और साल 1969 से साल 1990 तक उत्तर प्रदेश विधानसभा की सदस्य रही। साथ ही, साल 1969 से साल 1971 के बीच, वह सामाजिक कल्याण और अल्पसंख्यक मंत्री भी रही। इसके बाद साल 2000 में, उन्हें सामाजिक कार्य में उनके योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

💥4. दुर्गाबाई देशमुख💥
दुर्गाबाई देशमुख का जन्म 15 जुलाई 1909 को राजमुंदरी में हुआ था। बारह वर्ष की उम्र में उन्होंने गैर-सहभागिता आंदोलन में भाग लिया और आंध्र केसरी टी प्रकाशन के साथ उन्होंने मई 1930 में मद्रास शहर में नमक सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया। साल 1936 में उन्होंने आंध्र महिला सभा की स्थापना की, जो एक दशक के अंदर मद्रास शहर में शिक्षा और सामाजिक कल्याण का एक महान संस्थान बन गया। वह केंद्रीय सामाजिक कल्याण बोर्ड, राष्ट्रीय शिक्षा परिषद और राष्ट्रीय समिति पर लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा जैसे कई केंद्रीय संगठनों की अध्यक्ष थीं। वह संसद और योजना आयोग की सदस्य भी थी। वह आंध्र एजुकेशनल सोसाइटी (नई दिल्ली) से भी जुड़ी थीं। इसके बाद, साल 1971 में भारत में साक्षरता के प्रचार में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए दुर्गाबाई को चौथे नेहरू साहित्यिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। साल 1975 में, उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।

💥5. हंसा जिवराज मेहता💥
हंसा का जन्म 3 जुलाई 1897 को बड़ौदा के रहने वाले मनुभाई नंदशंकर मेहता के यहाँ हुआ था| हंसा ने इंग्लैंड में पत्रकारिता और समाजशास्त्र का अध्ययन किया। एक सुधारक और सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ-साथ वह एक शिक्षिका और लेखिका भी थीं। उन्होंने गुजराती में बच्चों के लिए कई किताबें लिखीं और गुलिवर ट्रेवल्स समेत कई अंग्रेजी कहानियों का भी अनुवाद किया। वह साल 1926 में बॉम्बे स्कूल कमेटी के लिए चुनी गयी और साल 1945-46 में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की अध्यक्ष बनी। हैदराबाद में आयोजित अखिल भारतीय महिला सम्मेलन में उनके राष्ट्रपति के संबोधन में उन्होंने महिलाओं के अधिकारों का चार्टर प्रस्तावित किया।

💥6. कमला चौधरी💥

कमला चौधरी का जन्म लखनऊ के समृद्ध परिवार में हुआ था। शाही सरकार के लिए अपने परिवार की निष्ठा से दूर जाने से वह राष्ट्रवादियों में शामिल हो गई और साल 1930 में गांधी द्वारा शुरू की गई नागरिक अवज्ञा आंदोलन में भी उन्होंने सक्रियता से हिस्सा लिया| वह अपने पचासवें सत्र में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की उपाध्यक्ष थी और सत्तर के उत्तरार्ध में लोकसभा के सदस्य के रूप में चुनी गयी थी| कमला भी एक प्रसिद्ध कथा लेखिका थी और उनकी कहानियां आमतौर पर महिलाओं की आंतरिक दुनिया या आधुनिक राष्ट्र के रूप में भारत के उद्भव से निपटाती थीं।

💥7. लीला रॉय💥
लीला रॉय का जन्म अक्टूबर 1900 में असम के गोलपाड़ा में हुआ था। उनके पिता डिप्टी मजिस्ट्रेट थे और राष्ट्रवादी आंदोलन के साथ सहानुभूति रखते थे। उन्होंने साल 1921 में बेथ्यून कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और सभी बंगाल महिला उत्पीड़न समिति की सहायक सचिव बनी और महिलाओं के अधिकारों की मांग के लिए मीटिंग की व्यवस्था की। साल 1923 में अपने दोस्तों के साथ उन्होंने दीपाली संघ और स्कूलों की स्थापना की जो राजनीतिक चर्चा के केंद्र बन गए, जिसमें उल्लेखनीय नेताओं ने भाग लिया। बाद में, साल 1926 में डाकरी संघ, दक्का और कोलकाता में महिला छात्रों के एक संगठन की स्थापना की गई थी।  वह जयश्री की एक पत्रिका की संपादिका भी बनी| साल 1937 में,  वह कांग्रेस में शामिल हो गईं और अगले वर्ष बंगाल प्रांतीय कांग्रेस महिला संगठन की स्थापना की। वह सुभाष चंद्र बोस द्वारा गठित महिला उपसमिती की भी सदस्य बन गईं। भारत छोड़ने से पहले नेताजी ने लीला रॉय और उनके पति को पार्टी गतिविधियों का पूरा प्रभार दिया। साल 1947 में, उन्होंने पश्चिम बंगाल में एक महिला संगठन और  भारतीय महिला संघती की स्थापना की। साल 1960 में, वह फॉरवर्ड ब्लॉक (सुभाषिस्ट) और प्रजा समाजवादी पार्टी के विलय के साथ गठित नई पार्टी की अध्यक्ष बन गईं।

💥8. मालती चौधरी💥
मालती चौधरी का जन्म साल 1904 में पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। साल 1921 में, सोलह साल की उम्र में मालती चौधरी को शांति-निकेतन भेजा गया, जहां उन्हें विश्व भारती में भर्ती कराया गया। उन्होंने नाबकृष्ण चौधरी से विवाह किया, जो बाद में ओडिशा के मुख्यमंत्री बने और साल 1927 में ओडिशा चले गए। नमक सत्याग्रह के दौरान, मालाती चौधरी और उनके पति भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए और आंदोलन में भाग लिया। उन्होंने सत्याग्रह के लिए अनुकूल वातावरण बनाने के लिए लोगों के साथ संवाद किया।  

💥9. पूर्णिमा बनर्जी💥
पूर्णिमा बनर्जी इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कमेटी की सचिव थी। वह उत्तर प्रदेश की महिलाओं के एक कट्टरपंथी नेटवर्क में से थी जो साल 1930 के दशक के अंत में वे स्वतंत्रता आंदोलन में सबसे आगे थीं। उन्हें सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी भागीदारी के लिए गिरफ्तार किया गया था। शहर समिति के सचिव के रूप में वह ट्रेड यूनियनों, किसान मीटिंग्स और अधिक ग्रामीण जुड़ाव की दिशा में काम करने और संगठित करने का दायित्व भी उनके ऊपर था|

💥10. राजकुमारी अमृत कौर💥
अमृत ​​कौर का जन्म 2 फरवरी 1889 में लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। वह कपूरथला के पूर्व महाराजा के पुत्र हरनाम सिंह की बेटी थी| उन्हें इंग्लैंड के डोरसेट में शेरबोर्न स्कूल फॉर गर्ल्स में शिक्षित किया गया था| वह महिलाओं की शिक्षा व खेल में उनकी भागीदारी और उनकी स्वास्थ्य देखभाल में दृढ़ आस्तिक थीं। उन्होंने ट्यूबरकुलोसिस एसोसिएशन ऑफ इंडिया व सेंट्रल लेप्रोसी एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की| साथ ही, वह लीड ऑफ रेड क्रॉस सोसाइटी के गवर्नर बोर्ड और सेंट जॉन एम्बुलेंस सोसाइटी की कार्यकारी समिति की अध्यक्षता में उपाध्यक्ष थी। साल 1964 में जब उनकी मृत्यु होने के बाद द न्यूयॉर्क टाइम्स ने उन्हें अपनी देश की सेवा के लिए  ‘राजकुमारी’ की उपाधि दी|  

💥11. रेनुका रे💥
रेनुका एक आईसीएस अधिकारी सतीश चंद्र मुखर्जी की बेटी थीं| उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से बीए की पढ़ाई पूरी की। साल 1934 में, एआईडब्ल्यूसी के कानूनी सचिव के रूप में उन्होंने ‘भारत में महिलाओं की कानूनी विकलांगता’ नामक एक दस्तावेज़ प्रस्तुत किया| रेणुका ने एक समान व्यक्तिगत कानून कोड के लिए तर्क दिया और कहा कि भारतीय महिलाओं की स्थिति दुनिया में सबसे अन्यायपूर्ण में से एक थी। साल 1943 से साल 1946 तक वह केन्द्रीय विधान सभा, संविधान सभा और अनंतिम संसद की सदस्य थी। साल 1952 से 1957 में, उन्होंने पश्चिम बंगाल विधानसभा में राहत और पुनर्वास के मंत्री के रूप में कार्य किया। इसके साथ ही, वह साल 1957 में और फिर 1962 में वह लोकसभा में मालदा की सदस्य थे। उन्होंने अखिल बंगाल महिला संघ और महिला समन्वयक परिषद की स्थापना की।

💥12. सरोजिनी नायडू💥
सरोजिनी नायडू का जन्म हैदराबाद में 13 फरवरी 1879 को हुआ था। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष होने वाली भारतीय महिला थीं और उन्हें भारतीय राज्य गवर्नर नियुक्त किया गया था। उन्हें लोकप्रिय रूप से ‘नाइटिंगेल ऑफ इंडिया’ भी कहा जाता है। उन्होंने किंग्स कॉलेज (लंदन) और बाद में कैम्ब्रिज के गिरटन कॉलेज में अध्ययन किया। साल 1924 में उन्होंने भारतीयों के हित में अफ्रीका की यात्रा की और उत्तरी अमेरिका का दौरा किया| भारत वापस आने के बाद उनकी ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों के चलते उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा| सरोजिनी नायडू अपनी साहित्यिक शक्ति के लिए भी जानी जाती थी।

💥13. सुचेता कृपलानी💥
सुचेता का जन्म हरियाणा के अंबाला शहर में साल 1908 में हुआ था| उन्हें विशेषरूप से साल 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी भूमिका के लिए याद किया जाता है। कृपलानी ने साल 1940 में कांग्रेस पार्टी की महिला विंग की भी स्थापना की। आज़ादी के बाद, कृपलानी के राजनीतिक कार्यकाल में नई दिल्ली के एक सांसद और फिर उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार में वह श्रम, सामुदायिक विकास और उद्योग मंत्री के रूप में कार्यरत रही। वह भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री थीं।

💥14.विजयलक्ष्मी पंडित💥
विजयलक्ष्मी पंडित का जन्म 18 अगस्त 1900 में इलाहाबाद में हुआ था और वह भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बहन थीं। साल 1932 से 1933, साल 1940 और साल 1942 से 1943 तक अंग्रेजों ने उन्हें तीन अलग-अलग जेल में कैद किया था। राजनीति में विजया का लंबा करियर आधिकारिक तौर पर इलाहाबाद नगर निगम के चुनाव के साथ शुरू हुआ। साल 1936 में, वह संयुक्त प्रांत की असेंबली के लिए चुनी गयी  और साल 1937 में स्थानीय सरकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्री बनी| ऐसा पहली बार था जब एक भारतीय महिला कैबिनेट मंत्री बनी। सभी कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारियों की तरह उन्होंने साल 1939 में ब्रिटिश सरकार की घोषणा के विरोध में इस्तीफा दे दिया।

💥15. एनी मास्कारेन💥
एनी मास्कारेन का जन्म केरल के तिरुवनंतपुरम में एक लैटिन कैथोलिक परिवार में हुआ था। वह त्रावणकोर राज्य से कांग्रेस में शामिल होने वाली पहली महिलाओं में से एक थीं और त्रावणकोर राज्य कांग्रेस कार्यकारिणी का हिस्सा बनने वाली पहली महिला बनीं। वह त्रावणकोर राज्य में स्वतंत्रता और भारतीय राष्ट्र के साथ एकीकरण के आंदोलनों के नेताओं में से एक थीं। अपनी राजनीतिक सक्रियता के लिए, उन्हें साल 1939 से साल 1977 से विभिन्न अवधि के लिए कैद किया गया था। मास्कारेन भारतीय आम चुनाव में साल 1951 में पहली बार लोकसभा के लिए चुनी गयी थी| वह केरल की पहली महिला सांसद थी


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