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तुम गए ही नही पिता- संदीप नाइक

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Saturday, June 20, 2020


अब चिट्ठियां आती नही तुम्हारे नाम - बिजली, फोन, मकान के टैक्स से लेकर राशन कार्ड तक में बदल गए है नाम 

कोई डाक, पत्रिका, निमंत्रण तुम्हारे नाम के आते नही 

हमारे बड़े होने के ये नुकसान थे और एक सिरे से तुम्हारा नाम हर जगह गायब था 

कितनी आसानी से नाम मिटा दिया जाता है हर दस्तावेज़ से और नाम के आगे स्वर्गीय लगाकर भूला दिया जाता है कि अब तो स्वर्ग में हो वसन्त बाबू और बच्चें तुम्हारे ऐश कर रहें हैं

बच्चों से पूछता नही कोई कि बच्चें कितना ख़ाली पाते हैं अपने आपको कि हर दस्तावेज़ से नाम मिटाकर अपना जुड़वाने में कितनी तकलीफ़ हुई थी और अब जब बरसों से सब कुछ बिसरा दिया गया है तो नाम भी लेने पर काँप जाती है घर की नींव जिसमे तुम्हारे पसीने और खून की खुशबू पसरी है 

घर में मिल जाती है कोई पुरानी याद तो घर के दरवाज़े और छतें सिसकियों से भर उठती है रात के उचाट सन्नाटों में ..

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संदीप नाईक 
सी 55, कालानी बाग
देवास मप्र 455001
मोबाइल 9425919221
(देवास मप्र में रहते है, 34 वर्ष विभिन्न प्रकार के कामों और नौकरियों को करके इन दिनों फ्री लांस काम करते है. अंग्रेज़ी साहित्य और समाज कार्य मे दीक्षित संदीप का लेखन से गहरा सरोकार है, एक कहानी संकलन " नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथाएँ" आई है जिसे हिंदी के प्रतिष्ठित वागीश्वरी सम्मान से नवाज़ा गया है , इसके अतिरिक्त देश की श्रेष्ठ पत्रिकाओं में सौ से ज़्यादा कविताएं , 150 से ज्यादा आलेख, पुस्तक समीक्षाएं और ज्वलंत विषयों पर शोधपरक लेख प्रकाशित है)

पुरुषों में बढ़ते डिप्रेशन का ग्राफ- भारती गौड़

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Tuesday, June 16, 2020

भारत में पुरुषों की तुलना में महिलाओं में डिप्रेशन अधिक होता है किन्तु आत्महत्या पुरुष ज़्यादा करते हैं। क्यों.. आइये बताती हूँ।
मैं ज़्यादा नहीं लेकिन थोड़े बहुत आँकड़े रखना चाहूँगी जिससे तस्वीर साफ़ हो। मैं अगर मेरे राजस्थान विशेष की बात करूँ तो बीते दस बरसों में 14 हज़ार 719 महिलाओं ने जबकि 34 हज़ार 249 और एक ट्रांसजेंडर ने राजस्थान में आत्महत्या की।
महिलाओं में डिप्रेशन ज़्यादा होता है पुरुषों की तुलना में लेकिन आत्महत्या पुरुष ज़्यादा करते हैं महिलाओं की तुलना में क्योंकि पुरुषों में डिप्रेशन होता है ये बात आपके समाज में पहले स्तर पर तो स्वीकार नहीं की जाती। जब स्वीकार ही नहीं की जाती आसानी से तो इलाज और उबरना भी उतना ही मुश्किल रहेगा। कहाँ जाकर दिल खाली करें!
कैसे... वो ऐसे...
सख्ती की चादर, मर्दवादी कंडीशनिंग, कठोर ह्रदय, मर्द को दर्द नहीं होता, यार मैं भी बिखर गया तो कैसे चलेगा... खुद ही के खिलाफ खुद के द्वारा खड़ी की गई दीवारें जिनको अभेद्य बनाने के जतन भी स्वयं द्वारा। कठोरता का आवरण और उस पर बेदर्दी से सीमेंट चढ़ाकर और पक्का कर देना।

मेरे पास लड़के ज्यादा आते हैं डिप्रेशन के पेशेंट्स।
  • 'मर्द होकर रोता है!'
  • लड़का होकर लड़कियों की तरह आँसू बहा रहा है!'
  • शर्म आनी चाहिए इससे अच्छा तो लड़की ही पैदा हो जाता!'
  • 'अब आदमी ज़ात को कहाँ शोभा देता है यूँ टूटना!'
  • 'मर्द भी यूँ रोने लगे तब तो चल गया घर!'
  • 'इसको किस बात का डिप्रेशन, सुंदर बीवी, बच्चे, अच्छी खासी नौकरी!'
  • 'मर्द है भी कि नहीं! देखो तो कैसे कोने में बैठकर रो रहा है!' आदि इत्यादि।

मैं एक बात कोट करना नहीं भूलती हूँ कि घर से मिली कंडीशनिंग आपका मरते दम तक पीछा नहीं छोड़ती चाहे अच्छी हो चाहे बुरी और दुर्भाग्यवश जेंडर के मामले में हमारे यहाँ बहुत गंदगी मची हुई है।

लड़का है तो नौकरी करनी ही होगी। सपने में भी नहीं सोच सकता कि घर संभाल ले। उसको सहूलियत ही नहीं कि बिना नौकरी का सोचे जीवन बिता दे। अपवाद की बात हम नहीं करेंगे क्योंकि उससे उदाहरण नहीं बनते।दबाव की बाते करें तो ये सिर्फ समाज या परिवार का ही बनाया हुआ नहीं है पुरुषों पर, ये उनका स्वयं का भी पैदा किया हुआ है।

तनाव/विषाद और स्ट्रेस (प्रतिबल) क्या होता है:
परिस्थितियाँ, जो व्यक्ति को समायोजन और समाधान से दूर ले जाती हैं, उसमें संवेगात्मक विचलन और विरोध पैदा करती है, तनाव के रूप में सामने आती हैं। ऊपरी तौर पर ना भी उस तरह से दिखाई दे किन्तु अन्दर ही अन्दर इस कदर संचय हो जाता है तनाव का कि व्यक्तित्व में जटिलता आ जाती है फलस्वरूप दिनचर्या से लगाकर मानसिक स्वास्थ्य तक इसकी ज़द में आकर भयंकर परिणाम की और निकल पड़ते हैं।

स्ट्रेस क्या है; दबावपूर्ण परिस्थितियों में स्वयं को असमायोजन से भरी मानसिक जटिलताओं से घिरा हुआ पाना।
साधारण शब्दों में कहूँ तो कुल मिलाकर समायोजन न कर पाना ही आपका तनाव है, प्रतिबल है जिसके फलस्वरूप अंतर्द्वंद (conflict), कुंठा (frustration) और दबाव (pressure) पैदा होते हैं।
अंतर्द्वंद- अंतर्द्वंद तब होता है जब दो विरोधी उद्दीपक( परिस्थितियाँ) उत्पन्न हो जाए और दोनों को एक साथ पाने की ललक हो और वो संभव ना हो।
कुंठा- उन दो विरोधी प्रेरकों को ना पाने से उत्पन्न स्थिति कुंठा है।
दबाव- उपर्युक्त वर्णित दोनों अवस्थाओं से निकलने या उनको जीतने की स्थिति।
कमोबेश एक ही तरह के कारण होते हैं महिलाओं और पुरुषों के तनाव के किन्तु पुरुषों में कुछ बातें अलग तरह से दबाव डालती हैं यथा;
  1. पुरुषत्व का दबाव; जो मैंने सबसे पहले ऊपर बताया।
  2. पुरुषों के रोने पर उन्हें शर्मिंदगी महसूस करवाना।
  3. खुद स्वीकार न करना कि हम अवसाद में हैं।
  4. पारिवारिक दबाव जिसमें सदियों पुरानी कंडीशनिंग से लगाकर उसे आज तक पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित करती पारिवारिक और सामाजिक इकाईयाँ।

क्यों होता है डिप्रेशन:
  1. जैविक करक; इसमें संक्रामक रोग, शारीरिक आघात, आहार से सम्बंधित दोष, नशा आती इत्यादि आते हैं।
  2. मनोवैज्ञानिक करक; इसमें कुंठा, असफलताएँ, हानियाँ, पर्सनल लिमिटेशंस, फीलिंग ऑफ़ गिल्ट, असंबद्धता और निरर्थकता, अंतर्द्वंद, दबाव आदि आते हैं।
  3. सामाजिक कारक; इसमें राजनीतिक उथल पुथल, युद्ध हिंसा, समूह पूर्वाग्रह और उससे उपजे पक्षपात एवं विवाद आदि।
  4. आर्थिक और कार्य से सम्बंधित कारक, विवाह और निजी रिश्तों से उपजी समस्याएँ जिनका कैनवास बहुत फैला हुआ है, कारकों में आते हैं।
मेरे पास आने वाले डिप्रेशन के पेशेंट्स को सबसे पहले मैं एक ही काम करवाती हूँ और वो है खुलकर रोना। जितने सेशंस हो जाएँ तो हो जाएँ, रोइए पहले। कहना नहीं पड़ता, उनके अवसाद को जगह मिलते ही वो रोना चाहते हैं और रोते हैं।
एक बात बहुत स्पष्ट रूप से बता देना चाहती हूँ कि जो रो नहीं सकते वो मजबूत नहीं बल्कि उन्हें हार्मोन्स से सम्बंधित समस्या है इसलिए किसी के ना रोने को ग्लोरिफाई मत कीजिए ये उनके लिए चिंता का विषय है।
पुरुषों के अवसाद को स्पेस नहीं मिलता क्योंकि जो कारण मैंने ऊपर बताएँ हैं जिसमें उन पर थोपे गए कारणों के साथ साथ उनके खुद के भी पैदा किए गए कारन मुख्य हैं। ये मुख्या वजह है कि विषद होता औरतों में ज़्यादा है किन्तु आत्महत्या पुरुष ज़्यादा करते हैं।
आप अपनी ज़िंदगी में पुरुषों को ना सिर्फ इनके रोने का स्पेस दें, सहूलियत दें, बल्कि उनके द्वारा की जा रही आत्महत्याओं को रोकने में अहम् भूमिका निभा सके हैं।
क्या औरत और क्या पुरुष, इस समाज में आपको चारों तरफ बराबर से पुरुष के रोने को कायरता से जोड़ते लोग मिलते हैं। क्यों हैं ऐसा?
आपको तो ये भी कहाँ पता है कि पुरुष ज़्यादा आत्महत्या करते हैं क्योंकि वो अपने अवसाद से लड़ नहीं पाते वही पुरुष जिसे मर्द शब्द से इतना खोखला कर दिया गया है कि खुद को मार देने से उसे परहेज़ नहीं और इस बीमार ग्रंथि को पोसने वाले जहाँ तक नज़रें दौड़ाएंगे, नज़र आएँगे।
रोने क्यों नहीं देते आप पुरुषों को! रोना कोई मानसिक अवस्था नहीं है। शारीरिक है। हार्मोन्स से जुड़ी हुई है। आप कौन होते हैं उसे रोकने वाले। भूख लगी खाना खाया, प्यास लगी पानी पिया, शरीर की तलब लगी सेक्स किया तो रोना आया तो रोए क्यों नहीं?
ये तो बात हुई समाज और परिवार की जिसकी वजह से पुरुषों में अवसाद उन्हें एक अलग स्तर पर ले जाने वाले कारणों में से अहम् भूमिका में है।

आप ही के द्वारा डिप्रेशन से छुटकारा पाने के तरीकों पर।
1. स्त्रोत- उस स्त्रोत की पहचान कीजिए जिससे तनाव पैदा हुआ और जगह घेरता जा रहा है।
2. अहम्- पुरुषों में एक नेचुरल अहम् की प्रवर्ती होती है जिसकी वजह से वो स्वीकार करने में बहुत वक़्त लगा देते हैं, तो उससे दूर होने के लिए थोड़ा होम वर्क कीजिए और अपने से अपोज़िट जेंडर वाले व्यक्ति के सामने अपनी बात रखिए।
3. काम को अंजाम देने की सक्रियता और निष्क्रियता में स्पष्ट अंतर पहचानिए। करना चाहते भी हैं या नहीं कोई काम या करना चाहते हैं लेकिन एफ्फ़र्ट्स ही नहीं हैं।
4. तनाव को खदेड़ने की प्रत्यक्ष प्रतिक्रियाएँ बनाम अप्रत्यक्ष प्रतिक्रियाएँ-
4.1 प्रत्यक्ष में स्थायी समाधान मिलेगा आपको जैसे कि अटैक; इसमें सीधी कार्यवाही परिस्थितियों और अवांछित लोगों के प्रति। साधारण शब्दों में कहूँ तो वस्तुनिष्ठ निर्णय ना कि व्यक्तिनिष्ठ।
4.2 वापसी(withdrawal) इसके लिए मैं आपको अभी का ताज़ा उदाहरण दूँगी। जैसे कोरोना। आपके पास इससे लड़ने के रास्ते अभी नहीं है इसलिए इससे दूर रहना और भागना आपको बचाएगा। हर वक़्त सामना करना और लड़ना भी समझदारी नहीं है। कभी कभी आपको भागना भी पड़ता है और वो भागना पॉजिटिव है।
4.3 समझौता- इसमें समझौतापूर्ण संधान मदद करेगा। मतलब अड़े ना रहना किसी बात पर जिससे तनाव बढ़ता जाए।
4.4 अप्रत्यक्ष प्रतिक्रियाओं में मनोवैज्ञानिक स्तर पर समाधान आते हैं। मैंने पिछले लेख में इस पर डिटेल में लिखा है तो इसके लिए आप उस पर जाएँ।
5. डिप्रेशन में सबसे ज़्यादा कारगर समाधान कार्य निर्देशित प्रतिक्रियाएँ (task oriented reactions) ही हैं। ऑटोमेटिक और सुनियोजित तरीके इसमें मुख्य हैं जैसे;
5.1 समस्या को पहले स्तर पर समझना।
5.2 वैकल्पिक समाधान पर जाना।
5.3 सेफ निर्णय लेना।
5.4 फोलोअप करना।

दोस्तों सब तरीकों पर भरी पड़ता है एक तरीका और वो है रोना और खूब रोना। रोने के लिए सामाजिक अनुमोदन की ज़रूरत नहीं है जिस दिन आप खुद भी ये बात औरतों की तरह समझ जाएँगे, बहुत कुछ सुलझ जाएगा।
रोने से समस्या नहीं सुलझती कहने वालों से सोशल डिसटेंसिंग बनाए रखिए। पुरुषों को रोने पर ताने मारने वालों में स्वयं पुरुषों के अलावा औरतों की भी बहुत बड़ी भागीदारी है इसलिए आज से और अभी से आप जब भी किसी को "मर्द" होने का हवाला देकर रोने से रोके तब समझ ले कि आप गुनाहगार है उसके अवसाद को एक कदम और आगे धकेलने में।
मैं उन लोगों के लिए लिखती हूँ जिन्हें मेरी ज़रूरत है और जो ठीक होना चाहते हैं। जो ना तो खुद ठीक हैं और ना किसी को ठीक होता देखना चाहते हैं अपने "इफ" और "बट" के साथ ऐसे लोगों को एक सेकंड के लिए भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
पिछले लेखों के सन्दर्भ के बिना ना पढ़ें, चूक सकते हैं। एक लेख में सब कुछ समाहित हो भी नहीं सकता।
जो पुरुष स्वीकार कर सकते हैं कि वो डिप्रेशन में हैं और जो रोते हैं वो सबसे मजबूत हैं। ध्यान रखिए क्योंकि ये प्राकृतिक है।

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भारती गौड़ 
Author of जाह्नवी, Counsellor (Psychologist)

खून की बून्द और लाखों जीवन- संदीप नाईक

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Saturday, June 13, 2020

फोन की घण्टी बजती है स्क्रीन पर कोई अनजान नंबर है मैं फोन उठाता हूँ हेलो कहता हूँ और उधर से हड़बड़ाहट में आवाज आती है
" हेलो सर , आपका नम्बर सुधीर ने दिया है मुझे मेरे बच्चे के लिए खून चाहिए, ओ निगेटिव ग्रुप है सर प्लीज़ कुछ इंतज़ाम  करवा दीजिये हम लोग बाहर के है किसी को जानते नही है "

ये पैनिक कॉल है उनके लिए जो अचानक से मुसीबत में आ गए है पर उनके लिए यह पैनिक नही है जिन्हें फोन आया है , वे जवाब देते हैं हां देखते है किसी को खोजते है और फोन रख दिया जाता है

जिसे खून चाहिए अपने किसी भी परिजन के लिए या दोस्त के लिए वो लगातार फोन घूमा रहा है पर डोनर नही मिल रहे, मिल भी रहे तो व्यस्त है , शहर से बाहर है, काम पर है या अभी कल ही किसी को दिया था अब तीन माह दे नही पायेंगे - ये कुछ जवाब है जो अमूमन रक्त की मांग करने पर मिलते है. मुश्किल से पांच या दस प्रतिशत लोग हाँ कहते है और समय पर बताई हुई निर्धारित जगह पर खून देने जाते है 


मान्यताएं और समस्या 

भारतीय समाज मे रक्तदान अभी भी मिथकों के बीच गुजर रहा है रक्त जैसी चीज के लिए हम अभी भी मनुष्य के दान पर ही निर्भर है और इसका मनुष्य के अतिरिक्त कोई विकल्प नही है परंतु मान्यताएं और कई सारे ऐसे मानवीय पहलू है जिन्होंने इसे प्रचलित किया और समाज मे स्वीकार्य बनाया है , आज बहुत से लोग इसे अपना पुनीत कर्तव्य मानते हुए सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखकर रक्तदान करते है

स्वास्थ्य की एक शासकीय परियोजना में काम करते हुए देखता था कि आदिवासी क्षेत्रों के दूरस्थ इलाकों से महिलाएं जचकी के लिए शासकीय अस्पतालों में संस्थागत प्रसव के लिए आती थी जिनका हीमोग्लोबिन फूल टर्म पर चार या पांच ग्राम प्रति लीटर होता था, जब उनके पति या रिश्तेदारों से खून देने की अपील की जाती तो वे कहते थे कि हम खून नही देंगे - बीबी मरती हो तो मर जाये, पूछने पर कहते थे कि खून देने से कमजोरी आती है और नपुंसकता बढ़ती है , यह हालत तो हुई ग्रामीण क्षेत्रों की जहां कुपोषण या अल्प पोषण से महिलाएं कमजोर और गम्भीर एनीमिया की शिकार रहती है साथ ही चार से छह बच्चों को जन्म देना उनकी नियति बन जाता है पर शहरी क्षेत्रों में हालात बहुत अच्छे नही है

मेरे जानने वालों में कई मित्रों के बच्चे है जो थैलेसीमिया से पीड़ित है और उन्हें हर माह खून की जरूरत पड़ती है पर शहरी इलाकों में एक यूनिट खून का इंतज़ाम करने में अक्सर हाथ पांव फूल जाते है, कई गम्भीर रोग है जिनमे मरीजों को नियमित रूप से खून की आवश्यकता होती है , मेरे छोटे भाई की किडनी सन 2003 में जब फेल हुई तो उसका डायलिसिस चालू हुआ , दो वर्षों बाद ही उसे हर डायलिसिस के समय एक यूनिट खून की आवश्यकता पड़ने लगी, जान - पहचान में अक्सर मैं निगाह रखता था कि कौन सम्भावित रक्तदाता हो सकता था यहाँ तक कि मैंने मित्रों, रिश्तेदारों के नाम के साथ उनका रक्त समूह भी फोन बुक में सेव कर लिया था मसलन अंबुज "ओ पॉजिटिव" सोनी आदि और जब ये नम्बर बार बार आंखों के सामने से गुजरते तो हमेशा याद रहता , भाई का डायलिसिस उसकी मृत्यु यानि 2014 तक चला और मैं हर हफ्ते दो दानदाताओं की तलाश में रहता , रिज़र्व दाताओं की एक पृथक सूची थी उस समय व्यक्तिगत सम्बन्धों के आधार पर ही रक्त मिलता था

जीवन का ध्येय बनाये है 

आज सोशल मीडिया से लेकर विभिन्न संगठनों और समाजों के रक्तदाताओं के समूह बने है, वाट्सएप समूह है जहां अपील करने पर थोड़ी सुलभता से रक्त मिल जाता है, रेडियो पर भी आप खून की आवश्यकता के लिए उदघोषणा करवा सकते है , ब्लड बैंक में डोनर्स की सूची होती है. साथ ही अनेक लोगों ने इसे अपना ध्येय बना लिया है इंदौर में दीपक नाईक के लिए रक्तदान सबसे बड़ी और जरूरी प्राथमिकता है , उन्होंने अभी तक 128 रक्त दान करके रिकॉर्ड बनाया है - वे कहते है रक्त ऐसी चीज है जो बाज़ार में उपलब्ध नही है, इसलिये मेरे जीवन का उद्देश्य ही अब यही है, मेरे साथ मेरी टीम में सैंकड़ो लोग जुड़े है - हमे सूचना मिलने पर हममें से कोई भी तुरन्त रक्त दान करने पहुंच जाता है, दीपक कहते है अब हम थोड़ा सावधान भी है - हम कोशिश करते है कि रक्त उन लोगों को मिलें जो बच्चे है, युवा है और जिनमे जीवन की संभावना है, केंसर आदि जैसे गम्भीर मरीजों को देना अच्छी बात है पर इन्हें नियमित चाहिये और अंत सबको मालूम है इसलिये हम अब कोशिश करते है कि सम्भावनों से भरे जीवन को मदद पहुंचे, लोग रक्त का कई बार ग़लत इस्तेमाल भी करते है, कई रैकेट इसमें शामिल है बेहतर होता है कि आप इंदौर में है तो एमवहाय अस्पताल के ब्लड बैंक में जाकर दान करें और सम्पर्क करें जहां सेवा भावी समर्पित लोगों की टीम पूरी पारदर्शिता से काम करती है

सुनील धर्माधिकारी एक बैंक में काम करते है साथ ही समाज कार्य मे उनकी रुचि है - अपने मित्र प्रशांत बडवे के साथ मिलकर वे तरुण युवा मंच संचालित करते है जिसमे पांच सौ से ज्यादा युवा जुड़े है, ये युवा सूचना मिलने पर तुरन्त रक्तदान करने पहुंच जाते है और यह सब सेवा भाव से किया जाता है, सुनील बताते है कि बस हमे सूचना सही समय पर मिलना चाहिये - अभी प्रवासी मजदूरों के केस में एबी रोड इंदौर से लाखों लोग निकलें, तरुण युवा मंच ने जहां भोजन आदि की व्यवस्था की वही रोगियों को, गर्भवती महिलाओं को प्रसव के दौरान रक्त भी उपलब्ध करवाया 

पटना के कुमार प्रतिष्क अपने महाविद्यालय के छात्रों के साथ पटना शहर और आस पास के जिलों में रक्तदान करने वालों का समूह चलाते है, चमकी बुखार के समय उन्हें यह काम करने की प्रेरणा मिली और तब से वे इस पुनीत कार्य मे जुटे हुए है , वे कहते है " अभी भी रक्तदान को।लेकर पढ़े लिखें युवाओं में भ्रांतियां है , हम लगातार बात करके, डॉक्टर्स के व्याख्यान करवा कर उनकी शंकाओं को दूर करते है और रक्तदान के लिए प्रेरित करते है वे कहते है "रक्तदान महादान के मुहिम से जुड़ने पर हमें इससे जुड़ी कुछ परेशानियां भी देखने को मिली 

कई बार ऐसा होता है कि घर में बाकी सदस्यों में होने के बावजूद ब्लड के लिए कॉल करते हैं उन्हें यह लगता है कि इनका तो काम ही है ,इनसे व्यवस्था हो जाएगा,खुद देकर क्या करें , इस वजह से ऐसा भी होता है कि जिन्हें असल में जरूरत होती और जिनके पास उपलब्ध हो इसमें फर्क कर पाना मुश्किल होता है 

इसमें कोई दो राय नहीं की कोई भी व्यक्ति अपनी रुचि या समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हुए ऐसे मुहिम से जुड़ते हैं , पर चंद लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने निजी स्वार्थ या कह लें पैसों के लिए इन सारे मुहिम से जुड़ कर इसे दूषित भी करते हैं.  हम लोगों के पास भी कई ऐसे फोन कॉल आए जिसमें उन्होंने यह कहा की व्यवस्था करवा दीजिए रुपयों की चिंता मत कीजिए , पता नही शायद या तो मालूम नहीं कि रक्त पैसों में नहीं मिलता या वह समझते कि पैसा देख अच्छे अच्छे लोग बुरे बन जाते 

वास्तविकता यह है कि जब तक लोग ऐसे कार्यों से जुड़े लोगों को सराहने के साथ साथ खुद की मुहिम का हिस्सा नहीं बनेंगे तब तक रक्त की कमी से जान जाती रहेगी" 

रक्तदान दिवस 

विश्व रक्तदान दिवस हर वर्ष 14 जून को मनाया जाता है विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा इस दिन को रक्तदान दिवस के रूप में घोषित किया गया है. देश मे नेशनल एड्स कंट्रोल संस्थान, रेडक्रॉस के साथ कई स्वैच्छिक संगठन है जो रक्तदान को बढ़ावा देने का काम करते है

रक्त हमारे शरीर का वह तरल पदार्थ है जो शरीर की कोशिकाओं को आवश्यक पोषक तत्व व ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है . रक्त की कमी के कारण देशभर में लाखों लोग अपनी जान गंवा देते हैं.

मूलतः रक्त 4 प्रकार के होते हैं A, B, AB और O
हर ग्रुप में RhD एंटीजेन पॉजिटिव और RhD एंटीजेन नेगेटिव के वजह से कुल 8 ग्रुप बन जाते हैं. एक औसत व्यक्ति के शरीर में 10 यूनिट यानि (5-6 लीटर) रक्त होता है. रक्तदान में केवल 1 यूनिट रक्त ही लिया जाता है. एक बार रक्तदान से आप 3 लोगों की जिंदगी बचा सकते हैं

कौन कर सकते हैं रक्तदान
18 से 60 वर्ष की आयु तक का कोई भी स्वस्थ व्यक्ति रक्तदान कर सकता हैं, अगर आपका वजन 45 किलो से ज्यादा है और शरीर मे हीमोग्लोबिन 12% से ज्यादा है तो आप रक्तदान कर सकते हैं. रक्त दाता का वजन, पल्स रेट, ब्लड प्रेशर, बॉडी टेम्परेचर आदि चीजों के सामान्य पाए जाने पर ही डॉक्टर्स या ब्लड डोनेशन टीम के सदस्य आपका ब्लड लेते हैं. NACO के मुताबिक 1 स्वस्थ व्यक्ति हर 3 महीने पे 1 बार रक्तदान कर सकता है

कौन नही कर सकते रक्तदान
पीरियड से गुजर रही या बच्चे को स्तनपान कराने वाली महिलाएं रक्तदान नहीं कर सकतीं, रक्तदान के 48 घंटे पहले अगर किसी ने एल्कोहल का सेवन किया है तो रक्तदान नहीं कर सकता, 18 साल से कम उम्र वाला व्यक्ति और 65 वर्ष से अधिक साल का व्यक्ति रक्तदान नहीं कर सकता, अर्थात रक्तदान के लिए वही लोग योग्य होते हैं, जिनका वज़न 40 किलो से अधिक होता है.

रक्तदान को लेकर गलत भ्रांतियां

  • रक्तदान से कमजोरी होती है 
  • रक्तदान से शरीर मे खून की कमी हो जाती है 
  • रक्तदान करने से हमेसा चक्कर आती है 
पर ऐसा कुछ भी सही नही है 

रक्तदान के फायदे
एक रिसर्च में पाया गया की रक्तदान के कई फायदे भी होते हैं - जैसे हार्ट अटैक, मधुमेह, कैंसर की आशंका कम होन. शरीर में कोलेस्टॉल की मात्रा घटना. शरीर में ज्यादा आयरन होना भी शरीर के लिए हानिकारक हो जाता है. रक्तदान करने से आयरन की मात्रा भी शरीर में नियंत्रित रहती है. 

इस समय आवष्यकता इस बात की है कि रक्तदान से सम्बंधित भ्रांतियां दूर कर जागरूकता बढ़ाई जाए ताकि लाखो जान बचाई जा सकें 

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संदीप नाईक 
सी 55, कालानी बाग
देवास मप्र 455001
मोबाइल 9425919221
(देवास मप्र में रहते है, 34 वर्ष विभिन्न प्रकार के कामों और नौकरियों को करके इन दिनों फ्री लांस काम करते है. अंग्रेज़ी साहित्य और समाज कार्य मे दीक्षित संदीप का लेखन से गहरा सरोकार है, एक कहानी संकलन " नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथाएँ" आई है जिसे हिंदी के प्रतिष्ठित वागीश्वरी सम्मान से नवाज़ा गया है , इसके अतिरिक्त देश की श्रेष्ठ पत्रिकाओं में सौ से ज़्यादा कविताएं , 150 से ज्यादा आलेख, पुस्तक समीक्षाएं और ज्वलंत विषयों पर शोधपरक लेख प्रकाशित है)

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